Monday, April 19, 2021
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20 साल में 1600 से घटकर 910 हुईं: दम तोड़ती ‘शाही हाउसबोट’, 8 महीने में 10 पानी में समा गईं, प्रदूषण की वजह से मरम्मत और नई बोट को मंजूरी नहीं


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एक मिनट पहले

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हाउसबोट में 4 बेडरूम तक होते हैं, इसका एक रात का किराया 2000 से 8000 रुपए है। इनकी कीमत 2-3 करोड़ होती है।

कश्मीर के पर्यटन की पहचान हाउसबोट दम तोड़ रही हैं। डल लेक, नगीन लेक और झेलम नदी पर तैरते आलीशान लकड़ी के महलों की संख्या 20 साल में 1600 से घटकर 910 रह गई हैं। 8 महीने में ही ऐसी 10 महल पानी में समा चुके हैं। हाउसबोट मािलक मोहम्मद शरीफ बताते हैं कि नई हाउसबोट बनाने और पुरानी हाउसबोट की मरम्मत करने पर पाबंदी है। ज्यादातर हाउसबोट 50 साल पुरानी हैं और समय बीतने के साथ जर्जर होती जा रही हैं।

हमें इनकी मरम्मत की भी इजाजत नहीं है। यही वजह है कि आज सिर्फ 910 हाउसबोट ही बची हैं। इनमें भी ज्यादातर बुरी स्थिति में हैं और इन्हें मरम्मत की जरूरत है। ऐसे ही चलता रहा तो एक दशक के बाद आपको एक भी हाउसबोट नहीं दिखेगी। 2009 में झीलों में प्रदूषण के लिए जिम्मेदार मानते हुए जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने हाउसबोट की मरम्मत पर रोक लगी दी थी। तब से पर्यटन विभाग के सामने 200 हाउसबोट की मरम्मत के मामले लंबित हैं।

एक अन्य हाउसबोट मालिक बशीर अहमद कहते हैं कि सरकारें डल लेक की बिगड़ती पारिस्थितिक के लिए हाउसबोट को जिम्मेदार मानती हैं। सच्चाई ये है कि झील के आसपास सैकड़ों होटल हैं। लाखों की आबादी है। होटल और घरों का सीवेज सीधे डल लेक में गिरता है।

वे कहते हैं कि हमारी हाउसबोट को मरम्मत चाहिए, नहीं तो ये सब पानी में डूब जाएंगी और हम अपनी पहचान खो देंगे। पर्यावरण कार्यकर्ता तारीक अहमद पतलू कहते हैं, झील को साफ रखना हर किसी की जिम्मेदारी है। हर दिन सीवेज का 4.2 करोड़ लीटर पानी डल लेक में गिरता है। इसमें हाउसबोट की हिस्सेदारी 1 फीसदी से भी कम है। ऐसे में सिर्फ हाउसबोट को ही दुर्दशा के लिए जिम्मेदार मानना ठीक नहीं है।

प्रशासन ने डल झील को बचाने के लिए 15 साल में 1 हजार करोड़ खर्च किए हैं। झील और जलमार्ग विकास प्राधिकरण के वाइस चेयरमैन तुफैल मट्टू कहते हैं कि प्रशासन ने हाउसबोट के संचालन के लिए नई पाॅलिसी बनाई है। सभी हाउसबोट को नियमों और मानदंडों पूरा करते हुए आनलाइन पंजीकरण कराना होगा। क्षतिग्रस्त हाउसबोट की मरम्मत का भी प्रावधान है। इस पर हाउसबोट मालिकों का कहना है कि जब पाॅलिसी लागू नहीं होती, तब तक हम कुछ नहीं कह सकते। क्योंकि पहले भी ऐसे कई प्रयास हुए, पर हमारी स्थिति नहीं बदली।

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