Monday, August 2, 2021
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भास्कर इंटरव्यू: दिल्ली दंगों के आरोप में एक साल जेल में रहीं नताशा-देवांगना बोलीं- एक छोटी सी खिड़की थी, जहां से हम रोज रात चांद देखते थे; बस वही हमारी उम्मीद थी


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  • ‘We Were Accused Of Being Terrorists, Stayed In Jail, Our Fear Was Gone, Now We Will Fight For Justice More Strongly’

नई दिल्ली4 मिनट पहलेलेखक: संध्या द्विवेदी

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पिछले साल दिल्ली में CAA-NRC के विरोध में लंबे समय तक आंदोलन चला। आंदोलन के दौरान ही दिल्ली के कुछ हिस्से दंगे की चपेट में आ गए। दंगाइयों की तलाश में पुलिस स्टूडेंट्स तक पहुंची और कई छात्र गिरफ्तार किए गए। जेएनयू की स्टूडेंट नताशा नरवाल और देवांगना कलिता को भी दंगे के आरोप में आतंकवाद विरोधी कानून (UAPA) के तहत गिरफ्तार कर जेल भेजा गया था। दोनों एक साल से ज्यादा समय तिहाड़ में रहीं। हाल ही में उन्हें दिल्ली हाईकोर्ट से जमानत मिली है। दैनिक भास्कर ने दोनों से लंबी बातचीत की। आप भी पढ़ें…

सवाल: आप दोनों एक साल से ज्यादा वक्त जेल में रहीं। दोनों पर देशद्रोह का आरोप है। इस दौरान क्या कुछ महसूस किया? औरत होने के नाते भी कुछ मुश्किलें आई हैं क्या?
नताशा
: कुछ दिनों तक तो हम भरोसा ही नहीं कर पा रहे थे कि जेल में हैं। एक-दूसरे को देखते तो हमारी आंखों में यही सवाल होता कि क्या यह सच है? धीरे-धीरे हमने इस रियलिटी को स्वीकारा तो एहसास हुआ कि जेल भी उसी पिंजरे का एक्सटेंशन है जिसे हम तोड़ने की बात करते हैं। पितृसत्ता का पिंजरा, जातिवाद का पिंजरा, मर्यादा का पिंजरा।
औरतों को तो पिंजरे में रहने की ट्रेनिंग बचपन से ही दी जाती है। ये मत करो, वहां मत जाओ, तेज मत हंसो, ज्यादा देर बाहर मत रहो। रोक-टोक, हर चीज के लिए परमिशन। तो एक नया रियलाइजेशन भी हुआ कि औरतों की जिंदगी कहीं न कहीं इसी कैद की तरह ही होती है। शायद इसीलिए बहुत ज्यादा अलग नहीं लगा। औरत की जिंदगी कई पिंजरों में बंधी होती है, जेल बस उसका इंटेस फाॅर्म है।

देवांगना: एक तो जेल जाना और दूसरा कोरोना के समय जेल जाना। 14 दिन तक हम बिल्कुल अकेले एक बैरक में बंद थे। एक किताब भी आपके पास नहीं थी, किसी से बात नहीं कर सकते, घर पर फोन कर नहीं सकते। हर एक पल भारी था। बस लगता था कोई तो पांच मिनट के लिए बाहर निकाल दे। मुझे खुलकर सांस लेनी है। बस, एक छोटी सी खिड़की थी, जहां से हम रोज रात को चांद देखते थे। वही उम्मीद थी हमारी। लेकिन, जैसा नताशा ने कहा कि जेल में रहते हुए मैं बार-बार सोसायटी के पिंजरों की तुलना वहां से करती थी।

सवाल: क्या पढ़ाई करते वक्त कभी अंदाजा था कि जेल भी जाना पड़ सकता है?
देवांगना:
नजीब, रोहित वेमुला या फिर अपने हक के लिए किसी भी लड़ाई में स्टूडेंट्स को डिटेन करना, उनके ऊपर वाटर कैनन चलाना। यह सब तो हो ही रहा था। पुलिस रिप्रेशन तो पहले से ही होता आ रहा है। जेल भी जा सकते हैं, इसका अंदाजा था, लेकिन हम पहली बार जेल जाएंगे वह भी UAPA के आरोप के तहत यह कभी नहीं सोचा था।

सवाल: आप लोगों को कितनी उम्मीद थी कि इस बार बेल मिल जाएगी?
नताशा:
जेल में रहने की हमने लंबी तैयारी कर ली थी। हम ऐसे आरोप में जेल में बंद किए गए थे, जिसमें कितने दिन लगेंगे इसका कुछ पता नहीं था। हमारी या हमारे साथ दूसरे लोगों की गिरफ्तारी का डर दिखाकर यह स्टूडेंट आंदोलन को दबाने का प्रयास था। हमारी बेल में अंतिम दम तक दिल्ली पुलिस ने अड़ंगे लगाए। इसलिए हम तो लंबी तैयारी से गए थे। वह तो दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले का नतीजा है कि हम आज बाहर हैं।

देवांगना: मौजूदा समय में असहमति की आवाजों को दबाने की नहीं बल्कि खत्म करने की कोशिशें जारी हैं। आपने कुछ भी ऐसा कहा जो सरकार के खिलाफ है तो जेल में डाल दिए जाओगे। यह खौफ भरा जा रहा है। हमने तो CAA-NRC के खिलाफ आंदोलन शुरू किया था। अंदाजा था कि हमें जेल से बाहर न आने देने की पूरी कोशिश की जाएगी। यह केवल हम जैसे कुछ लोगों का मामला नहीं था, यह तो हर उस आवाज को सबक सिखाने की कोशिश थी जो सरकार के खिलाफ उठी है और आगे भी उठ सकती है।

सवाल: आपने जेल में एक साल से ज्यादा का वक्त बिताया है। वहां कैदियों के ह्यूमन राइट्स किस हद तक बचते हैं?
देवांगना:
हमारा केस हाई प्रोफाइल हो गया था। हमें सपोर्ट भी था। हमारे लिए बाहर लड़ाई जारी थी, लेकिन कई कैदी तो ऐसे थे जिनके पास वकील तक नहीं था। वे सालों बिना किसी सुनवाई के ही जेल में बंद हैं।
बोलीविया की एक औरत एक साल से अपने बच्चों से नहीं मिली थी। और पता है सबसे खराब क्या हुआ? वह बिना अपने बच्चों से मिले कोरोना संक्रमण की वजह से मर गई। महामारी की वजह से बाहर से कोई आता जाता नहीं था। हरेक के पास फोन नहीं था, जिससे वीडियो कॉल से बात की जा सके। कई लोग ऐसे थे, जिनके अपने कोरोना संक्रमण से जूझ रहे थे। पर उनके पास बात करने का कोई जरिया नहीं था। मैंने एक याचिका भी डाली थी कि कम से कम लोगों को रोज अपने परिवार से बात करने की व्यवस्था करवाई जाए। अब आप समझ जाइए कि मानवाधिकार कितने सुरक्षित होंगे।

नताशा: बहुत सारे ऐसे लोग थे, जिनके लिए कोई लड़ने वाला नहीं था। उनकी कोई सुनने वाला नहीं था। हमारे पास यह उम्मीद तो थी, कि कोई हमारे लिए लड़ रहा है।

सवाल: जेल के भीतर आप लोगों के साथ कोई दुर्व्यवहार तो नहीं हुआ?
नताशा
: शायद हमारा केस इतना चर्चित था कि ऐसा कुछ अनुभव हमें हुआ नहीं। शुरू-शुरू में जरूर जेल का स्टाफ हमसे पूछताछ ज्यादा करता था। बार-बार यह पूछते थे कि क्या आरोप है तुम पर। फिर बाद में तो लोग हमारे ऊपर लगे आरोपों को उतना ही अविश्वसनीय मानने लगें, जितना हम मानते हैं।

सवाल: कैद के इस एक साल ने आपको तोड़ा या मजबूत किया?
नताशा:
कैद के इस एक साल ने मुझे तोड़ा नहीं, बल्कि मजबूत किया। भरोसा दिलाया कि हमारी लड़ाई सच्ची है। हमारे साथ बहुत लोग हैं। अब संघर्ष और तेज करना है। CAA-NRC का आंदोलन अभी क्या रूप लेगा कुछ तय नहीं है, लेकिन अपने और दूसरे के हक के लिए आवाज उठाते रहना है। कई पिंजरे तोड़े जाने हैं।

देवांगना: सच कहूं तो जेल जाने के बाद अब हमारे भीतर कोई डर नहीं बचा। वह एक कहावत है न कि किसी को इतना भी न डराओ कि उसके भीतर से डर ही निकल जाए। हमारे साथ यही हुआ है।

सवाल: क्या आपको लगता है कि मौजूदा समय में असहमति की आवाजों और विरोध प्रदर्शनों के लिए जगह कम होती जा रही है?
नताशा:
बिल्कुल, लगातार सरकार दमनकारी रवैया अपना रही है। असहमति की हर आवाज को दबाने की कोशिश की जा रही है। हालांकि, इससे विरोध के सुर भी ऊंचे होते जा रहे हैं। CAA-NRC के खिलाफ आंदोलन हो, किसान आंदोलन हो या फिर कोविड के समय मिसमैनेजमेंट। लोग खुलकर सरकार के खिलाफ बोल रहे हैं।

देवांगना: मुझे लगता है कि सहने की भी एक सीमा होती है, अब लोगों के सब्र का बांध टूटने लगा है। इसलिए अब लोग खुलकर विरोध जताने लगे हैं।

सवाल: नताशा, जब आप जेल में थीं तभी आपके पिता की मौत हो गई। एक बेटी अपने पिता को अंतिम विदाई भी नहीं दे पाई। एक बार भी मन में नहीं आया कि काश आप आंदोलन में नहीं होतीं?
नताशा
: पापा की तबीयत बिगड़ रही थी। मैं बस रोज 5 मिनट घर पर बात कर पाती थी। रोज यही पता लगता उनकी हालात खराब हो रही है। मैं इस एहसास को बता नहीं सकती। पूरे घटनाक्रम में इससे ज्यादा खराब कुछ भी नहीं हुआ। और यह एहसास पूरी जिंदगी मुझे खटकता रहेगा।

कम से कम मैं अपने पिता को अंतिम विदाई देने का हक तो रखती ही थी। आखिर मैंने ऐसा क्या कर दिया जिसकी वजह से मुझसे मेरा यह हक छीन लिया गया। लेकिन मेरे मन में यह ख्याल कभी नहीं आया कि मैं आंदोलन में क्यों थी? जब मैं उस दर्द को महसूस करती थी जो मेरे पापा की बिगड़ती तबीयत से मुझे हो रहा था तो मैं दूसरे कैदियों को देखती जो सालों से अपनों से दूर थे। कोई अपने बच्चे से तो कोई अपने परिवार से। तो अपना दर्द कम लगने लगता था।

सवाल: आप लोग बेल पर बाहर हैं, लड़ाई लंबी होगी, दोबारा भी जेल जाना पड़ सकता है। जिस वजह से आप लोग जेल गए थे, उस आंदोलन का भविष्य क्या है?
देवांगना
: हम जानते हैं कि लड़ाई अभी बहुत लंबी है। कैद दोबारा भी हो सकती है, पर हमारा संघर्ष चलता रहेगा। हर गैर बराबरी के खिलाफ, सिस्टम में भेदभाव के खिलाफ। दमन और शोषण के खिलाफ। आंदोलन तो चलता ही रहेगा।

न केवल नागरिकता बल्कि महामारी ने भी हमें यह बताया कि यहां तो जीने के अधिकार पर ही खतरा मंडरा रहा है। कोविड पीरियड में हेल्थ इन्फ्रास्ट्रक्चर के बिना लोगों ने जिस तरह दम तोड़ा, ऑक्सीजन, दवाओं और बेड के लिए लोग दर-दर भटकते रहे, उसे देखते हुए लगता है कि संघर्ष तो अभी केवल नागरिकता के अधिकार के लिए नहीं बल्कि जीने के अधिकार के लिए भी करना है।

नताशा: देखिए, जो अब हमारे साथ हो चुका, उससे ज्यादा अब कुछ नहीं हो सकता। जेल जाकर हमने देख लिया। वह भी आतंकवाद के आरोप में। तो अब सरकार के पास हमारे खिलाफ क्या ही होगा? लड़ाई लंबी है, लड़ते रहेंगे। दोबारा जेल जाना पड़ा तो फिर जाएंगे।

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