Thursday, May 13, 2021
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गाइडलाइन के बाद गायब हो रहे संदिग्ध चैट ग्रुप्स: सोशल मीडिया पर सख्ती से सुरक्षा एजेंसियों की चिंता, कहीं पूरी तरह डार्क वेब पर न शिफ्ट हो जाए आतंकी नेटवर्क


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नई दिल्ली7 मिनट पहलेलेखक: मुकेश कौशिक

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एन्क्रिप्शन तोड़ने की गाइडलाइन के बाद सोशल मीडिया पर चलने वाले कुछ ग्रुप अचानक बंद हो रहे हैं। (सिंबॉलिक फोटो)

  • अभी सोशल मीडिया पर निगरानी में आतंकियों के सुराग मिलते हैं

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के लिए जारी केंद्र सरकार की गाइडलाइंस के तहत जांच एजेंसियों के कहने पर सेवा प्रदाता को किसी भी संदिग्ध मैसेज का एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन तोड़ पूरे डिटेल देने होंगे। लेकिन इसके असर ने सुरक्षा एजेंसियाें काे चिंता में डाल दिया है। गाइडलाइन आने के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर चलने वाले कुछ ग्रुप अचानक बंद हो रहे हैं।

इन ग्रुप्स में शामिल मोबाइल नंबर्स दूसरे किसी एप पर शिफ्ट भी नहीं हो रहे हैं। अब तक सोशल मीडिया पर मौजूद आतंकी नेटवर्क के पुर्जों तक पहुंच बना पा रही सुरक्षा एजेंसियों को आशंका है कि अब यह नेटवर्क पूरी तरह डार्क वेब पर शिफ्ट हो सकता है। इसी चिंता के चलते खुद सुरक्षा एजेंसियों में ही एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन तोड़ने के सरकारी आदेश पर बहस शुरू हो गई है।

एन्क्रिप्शन टूल असैनिक स्पेस में आने से कहीं पहले अलकायदा ने 2007 में ‘मुजाहिद्दीन सीक्रेट्स’ नाम से अपना एन्क्रिप्शन टूल बना लिया था। इसके अगले साल मुजाहिद्दीन सीक्रेट्स.2 में अपडेट जारी किया। ऐसे एप्स पर नजर रख पाना सुरक्षा एजेंसियों के लिए लगभग असंभव है।

क्या है एन्क्रिप्टेड मैसेज?
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर जब आप एक मैसेज टाइप कर सेंड करते हैं तो उसे एक कोड में बदल दिया जाता है। इस कोड को खोलने की चाबी सिर्फ आपके या उस व्यक्ति के पास होती है जिसे मैसेज भेजा गया है। सोशल मीडिया कंपनियां प्राइवेसी के दावे करते हुए यहां तक कहती हैं कि आपका भेजा मैसेज वे भी नहीं पढ़ सकतीं।

इसका दुरुपयोग कैसे होता है
फेक न्यूज या अफवाह फैलाने या किसी को बदनाम करने के लिए ही नहीं सोशल मीडिया के ग्रुप्स का इस्तेमाल आतंकी संगठन भी करते हैं। दरअसल, इन संगठनों के कई छोटे-छोटे पुर्जे होते हैं जो सूचनाएं पहुंचाने का काम करते हैं।

इन्हें ‘ओवरग्राउंड ऑपरेटिव्स’ कहा जाता है। सामान्यत: ये ऑपरेटिव्स बहुत निचले स्तर के होते हैं, जिन्हें डार्क वेब इस्तेमाल करने की ट्रेनिंग देना संभव नहीं होता। इनसे संपर्क करने के लिए आतंकी संगठन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल करते हैं।

अभी मेटा डेटा से मिलती है इनकी खबर
गुप्तचर ब्यूरो में लम्बे समय तक काम कर चुके पूर्व अधिकारी हर्षवर्धन आजाद ने बताया कि मौजूदा व्यवस्था में सुरक्षा एजेंसियां कोई संदिग्ध मैसेज पकड़ में आने के बाद सोशल मीडिया सेवा प्रदाता से उसके डिटेल मांगती हैं।

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